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हनुमान जी के पंचमुखी (5 मुख वाले) अवतार की कथा1 min read

पंचमुखी

हनुमान जी के पंचमुखी अवतार की कथा

आप सभी ने कभी न कभी हनुमान जी की पंचमुखी प्रतिमा को मंदिरों में देखा होगा। क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी ने पंचमुखी रूप क्यों धारण किया? यह है हनुमान जी के पंचमुखी रूप धारण करने की कथा:

लंका में महाबलशाली मेघनाद के साथ भीषण युद्ध चला और मेघनाद मारा गया। रावण अब तक घमंड में चूर था। वह राम सेना और राम के भाई लक्ष्मण का पराक्रम सुन कर थोड़ा तनाव में ज़रूर आ गया था। रावण को दुखी देख उसकी माँ कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण के याद दिलाई। तभी रावण को याद आया कि वह दोनों उसके बचपन के मित्र रहे हैं। रावण यह अच्छी तरह जानता था कि अहिरावण और महिरावण दोनों ही तंत्र-मंत्र के महापंडित और माँ कामाक्षी के परम भक्त हैं।

रावण ने उन दोनों को बुलाया और कहा अपनी माया से राम और लक्ष्मण का अंत कर दो। यह बात दूतों के ज़रिये विभीषण को पता लगी। युद्ध में अहिरावण और महिरावण जैसे मायावी के शामिल होने कि बात सुन विभीषण चिंतित हो गए। उन्हें लगा कि अब राम और लक्ष्मण कि सुरक्षा कड़ी करनी पड़ेगी। इसके लिए उन्हें सबसे योग्य व्यक्ति हनुमान लगे।

भगवान राम की कुटिया स्वेल पर्वत पर बनी थी। हनुमान जी ने भगवान राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया। कोई जादू-टोना तंत्र-मंत्र का इस्तेमाल कोई भी मायावी इसके अंदर नहीं कर सकता था। अहिरावण और महिरावण दोनों ही भगवान राम को मारने उनकी कुटिया के पास पहुंचे पर हनुमान जी के सुरक्षा घेरे की वजह से उसकी एक न चली।

ऐसे में उन्होंने एक चाल चली। महिरावण विभीषण का रूप बना के कुटिया में गया। भगवान राम और लक्ष्मण पथ्थर की शिला पर सो रहे थे। दोनों राक्षसों ने राम और रावण को शिला सहित उठा लिया और पाताल की ओर ले जाने लगे। विभीषण को तुरंत पता लग गया की कोई अनहोनी हो चुकी है। विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि आप उसका पीछा करें। लंका में अपने रूप मे घूमना उनके लिए ठीक न था इसलिए उन्होंने पक्षी का रूप धारण किया और निकुंबला नगर पहुंचे।

वह पहुंच कर उन्होंने कबूतर और कबूतरी को बात करते सुना। कबूतर कबूतरी से कह रहा था अब तो रावण कि जीत पक्की है। अहिरावण और महिरावण राम लक्ष्मण की बलि चढ़ा देंगे। और बस सारा युद्ध समाप्त। उनकी बातें सुन हनुमान जी को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को उठा कर कामाक्षी देवी के मंदिर में उनकी बलि चढाने के लिए लेकर गए हैं।

हनुमान जी जल्द ही पाताल लोक पहुंच गए। वहाँ उन्हें एक पहरेदार मिला जिसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था। उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश करने से रोक दिया। दोनों में भयानक युद्ध चला। परन्तु हनुमान जी के आगे वह टिक न सका। हनुमान जी उस द्वारपाल कि तारीफ करने से खुद को रोक न सके। उन्होंने पूछा तुम कौन हो? उसने बताया मैं हनुमान जी का पुत्र हूँ और एक मछली से पैदा हुआ हूँ। मेरा नाम मकरध्वज है।

हनुमान जी वीर की बातें सुन कर आश्चार्यचकित हो गये। मकरध्वज ने आगे बताया लंका दहन के बाद जब हनुमान जी अपनी अग्नि शांत करने समुद्र में पहुंचे तभी उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा। उस समय माँ ने आहार के लिए मुँह खोला तो वह तेज उनके मुख में चला गया। और माँ गर्भवती हो गयी। उसी से हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज का जन्म हुआ।

मकरध्वज को हनुमान ने बताया कि वही हनुमान जी हैं। तभी मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किये और हनुमान जी ने भी मकरध्वज को गले लगाया। अपने आने का कारण बताया और कहा कि राम जी को बचाने में मेरी मदद करो।

मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में दोनों राक्षस यहां बलि के लिए आने वाले हैं। आप अपना रूप बदल कर कामाक्षी के मंदिर में जा कर बैठ जाएं और सारी पूजा झरोखे से करने को कहें। हनुमान जी मधुमख्खी का रूप ले कर माँ कामाक्षी के मंदिर में गए। और माँ कामाक्षी के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हुए और उन्होंने माँ कामाक्षी से पुछा क्या आप सच में भगवान राम और लक्ष्मण कि बलि चाहती हैं?

माँ कामाक्षी ने कहा, नहीं! मैं तो अहिरावण और महिरावण की बलि चाहती हूँ। यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी हैं। आप उसमे सफल रहोगे। मंदिर में अलग-अलग दिशाओं पर पांच दीये जल रहे थे। जिस दिन ये एक साथ बुझा दीये जायेंगे उस दिन इन दोनों का अंत होगा, माँ कामाक्षी ने कहा।

इसी बीच अहिरावण और महिरावण बलि देने के लिए मंदिर में पहुंचने ही वाले थे की हनुमान जी ने माँ कामाक्षी का रूप धारण किया और बोला मैं देवी कामाक्षी हूँ। मेरी पूजा झरोखे से करो। झरोखे से पूजा शुरू हुयी। बहुत सारा चढ़ावा चढ़ाया गया। और अंत में बंधक बनाये गए राम लक्ष्मण को उनके सामने डाला गया। हनुमान जी ने तुरंत ही दोनों को बन्धमुक्त किया। पाताल लोक से जाने से पहले हनुमान जी को माँ कामाक्षी के कहे अनुसार अहिरावण और महिरावण की बलि देनी थी। उन्होंने अपने पुत्र से कहा अचेत अवस्था में लेटे भगवान राम और लक्ष्मण का ध्यान रखें।

और उनके साथ मिल कर दोनों राक्षशों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। यह युद्ध आसान नहीं था। दोनों राक्षस एक बार मरते तो फिर पांच-पांच के रूप में ज़िंदा हो जाते। यह देख मकरध्वज ने हनुमान जी से कहा कि अहिरावण कि एक पत्नी नाग कन्या है। वह मन ही मन अहिरावण को पसंद नहीं करती। वह उसके सारे राज़ जानती है। अगर उससे मौत का उपाय पुछा जाए तो वह ज़रूर बताएगी। हनुमान जी ने मकरध्वज से दोनों राक्षसों को युद्ध में व्यस्त रखने को कहा और अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे।

उन्होंने कहा कि अगर तुम मुझे अहिरावण और महिरावण की मृत्यु का राज बताओ तो मैं तुम्हें उसके चंगुल से छुड़ा सकेंगे। अहिरावण की पत्नी ने कहा की मेरा नाम चित्रसेना है, मैं भगवान विष्णु की परम भक्त हूँ। मेरे रूप पर अहिरावण मोहित हो गया और मुझे यह ले आया। हनुमान जी ने अहिरावण से पुछा कि अहिरावण कि मृत्यु का राज बताने के बदले आप क्या चाहती हो? चित्रसेना ने कहा कि, अहिरावण जैसा असुर मुझे यह लाया इससे मेरा जीवन ख़राब हो गया। अगर आप श्री राम के साथ मेरा विवाह करवाने का वचन दें तो मैं आपको उनकी मृत्यु का राज बताउंगी।

हनुमान जी ने सोचा भगवान श्री राम तो पत्नी-निष्ट हैं। माता सीता को रावण कि कैद से मुक्त करवाने के लिए युद्ध लड़ रहे हैं, वह किसी और से विवाह का प्रस्ताव कभी स्वीकार नहीं करेंगे। परन्तु अगर उचित निर्णय न लिया गया तो राम जी के प्राण खतरे में पड़ जायेंगे। हनुमान जी ने कहा कि मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हारा विवाह श्री राम के साथ होगा परन्तु एक शर्त पर कि श्रीराम जिस पलंग पर हैं अगर वह उनके बैठे से टूट गया तो मैं अपने दिए वचन से मुक्त हो जाऊंगा। चित्रसेना ने शर्त मान ली।

अहिरावण और महिरावण की मृत्यु का भेद बताया कि एक बार अहिरावण और महिरावण एक भ्रामरी को पकड़ कर ले आये थे। यह भ्रामरी मायावी थी। इसकी पीड़ा सुन इसका पति भी यह आ गया। यह भौरे बहुत भारी संख्या में उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं। राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ या ये मरने को हो जाते हैं, तब भ्रामर उनके मुख में एक बूँद अमृत का डाल देते है और ये फिर से जीवित हो जाते हैं। इन्हे जितनी बार नया जीवन दिया गया उनके उतने रूप बन गए।

हनुमान जी यह जान कर वापस आये। मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था। हनुमान जी ने आते ही भवरों को मारना शुरू कर दिया। हनुमान जी के सामने भवरे टिक न सके। अंत में एक भावरा बचा था उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की भीख मांगी।

हनुमान जी ने उसे छमा करते हुए कहा की मैं तुम्हें नहीं मारूंगा लेकिन तुम यहां से चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी की पलंग ली पाटी में घुस उसे खोखला बना दोगे। वह चरण ही यह काम करने चल दिया। अहिरावण और महिरावण अपने चमत्कार के गायब होने से आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपना मायावी युद्ध जारी रखा।

हनुमान जी को कामाक्षी देवी का वचन याद आया की जब ये पांचों दीये एक साथ बुझ जायेंगे तभी वह अपना रूप बदल कर उनका वध कर पाएंगे। हनुमान जी ने उसी समय पंचमुखी रूप धारण किया और पंचमुखी रूप धारण कर के एक साथ ही पाँचों दीये बुझा दिए । हनुमान जी और मकरध्वज के द्वारा अहिरावण और महिरावण का वध हुआ। हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण जी की मूर्छा दूर की।

जैसे ही वे वहां से जाने लगे अहिरावण की पत्नी ने उन्हें रस्ते में ही रोक दिया। उन्होंने हनुमान जी को याद दिलाया कि आपने मेरा विवाह श्री राम के साथ करवाने का वचन दिया था। हनुमान जी श्री राम को चित्रसेना के पलंग पर बैठा दिया और उसका पलंग टूट गया।

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ धोखा हुआ है और उसने कहा कि श्री राम के सेवक किसी के साथ छल करें ये उचित नहीं है। वह हनुमान जी को श्राप देने ही जा रही थी कि श्रीराम का सम्मोहन टूटा। उन्होंने चित्रसेना को समझाया कि उन्होंने पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिए है इसलिए हनुमान को यह करना पड़ा उनको क्षमा कर दें।

लेकिन चित्रसेना तो श्रीराम से विवाह करने कि ज़िद पकड़े बैठी थी। श्री राम बोले में द्वापर युग में सत्यभामा के रूप में तुम्हें अपनी पत्नी बनाऊंगा इससे वह मान गयी। और हनुमान जी उन्हें उनके पिता के घर छोड़ आये। इसके बाद हनुमान जी श्रीराम और लक्ष्मण के साथ वापस स्वेल पर्वत पर चले गए।

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