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माँ कालरात्रि: सातवीं शक्ति (नवरात्र-7)1 min read

सातवीं शक्ति माँ कालरात्रि

सातवीं शक्ति माँ कालरात्रि

दुर्गा पूजा के सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है| इनका रंग काला होने के कारण इन्हें कालरात्रि कहते हैं| यह शुभ फलदायी है इसलिए इसलिए इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है| कथा के अनुसार दैत्य शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनो लोको में हाहाकार मचा रखा था| इससे चिंतित होकर सभी देवता गण शिवजी के पास गए| शिवजी ने देवी पारवती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तो की रक्षा करने को कहा| शिवजी की बात मान कर देवी पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुंभ निशुंभ का वद्ध किया| इसके पश्चात माँ दुर्गा ने रक्तबीज का वद्ध किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया| नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना इस मंत्र से की जा सकती|

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी। 
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

माँ कालरात्रि की पूजा

इस वर्ष माँ कालरात्रि की पूजा 3 अप्रैल को है| सप्तमी तिथि को भगवती की पूजा में गुड़ का नवदिया अर्पित करके ब्राह्मण को देना चाहिए| ऐसा करने से पुरुष शोक मुक्त हो जाते हैं| मान्यता ऐसी भी है की माता कालरात्रि की पूजा करने से मनुष्य समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है| माता कालरात्रि पराशक्तियों यानि काला जादू की साधना करने वाले जातकों के बीच बेहद प्रसिद्ध हैं| माँ की भक्ति से दुष्टों का नाश होता है और ग्रह बाधाएं दूर हो जाती हैं|

माँ कालरात्रि का स्वरूप

माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है| इनका रंग अंधकार के भाँति काला है और इनके केश बिखरे हुए हैं| गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है| इनके तीन नेत्र हैं और तीनो नेत्र ब्रम्हांड के सदृश्य गोल हैं| इनकी नासिका के स्वास प्रस्वास से अग्नि की भयंकर ज्वाला निकलती रहती हैं| इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है| ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा से सभी को वर प्रदान करती है| दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है| बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा और नीची वाले हाथ में खड़ग है|

शुभंकरी

माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत ही भयानक है| लेकिन यह सदैव शुभ फल दायिनी हैं, इसलिए इनको शुभंकरी भी कहा जाता है| अतः भक्तों को इनसे किसी भी प्रकार से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है| दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है| इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में स्थित होता है| इसके लिए ब्रम्हाण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता| इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरुप में अवस्थित रहता है| उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाती है| उसके समस्त पापों एवं विघ्नों का नाश हो जाता है| उसे अक्षय पुण्य लोकों की प्राप्ति ह जाती है|

दुष्टों का विनाश

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली है| दानव दैत्य राक्षश भूत प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं| माँ कालरात्रि ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं| उनके उपासक को अग्नि भय, जल भय, जंतु भय, शत्रु भय, रात्रि भय, आदि कभी नहीं होते| उनकी कृपा से वह सर्वथा भय मुक्त हो जाता है| माँ कालरात्रि के स्वरुप विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एक निष्ट भाव से माँ की उपासना करनी चाहिए| यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए| मन वचन काया को पवित्र रखना चाहिए|

कष्ट एवं पापों का विनाश

यह शुभंकारी देवी हैं इनकी उपासना से मनुष्य का जीवन शुभ हो जाता है| हमें निरंतर उनका स्मरण और पूजन करना चाहिए| माँ के इस अनोखे एवं अलौकिक रूप की आराधना करने से सारे दुःख कष्ट एवं पापों का विनाश होता है| इनकी रूप व शक्ति अत्यन्त ही अनोखी है| माता कहती है की मांगी हुई खुशियों से किसका भला होता है, किस्मत में जो लिखा होता है उतना ही अदा होता है| किसी के चाहने से न तो किसी का बुरा होता है, अतः मिलता वही है जो हमने बोया होता है|

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता |

नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ||

इस मंत्र का 108 बार जाप करने से मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और  माता रानी उसके सारे शोक और दुःख का विनाश करती है|

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