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श्री गुरु अर्जन देव जी का जीवन परिचय1 min read

श्री गुरु अर्जन देव जी का जीवन परिचय

श्री गुरु अर्जन देव जी का जीवन परिचय

श्री गुरु अर्जन देव जी

श्री गुरु अर्जन देव जी का जन्म सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास एवं माता भानी के घर, गोइंदवाल साहिब में 15 अप्रैल 1563 को हुआ था। श्री गुरु अर्जन देव साहिब सिख धर्म के पांचवे गुरु है। वे शिरोमणि सर्वधर्म समभाव के प्रखर पैरोकार होने के साथ साथ मानवीय आदर्शो को कायम रखने के लिए आत्म बलिदान करने वाले एक महान आत्मा थे।

पांचवे गुरु

गुरु अर्जन देव जी की निर्मल प्रवर्ति, सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठा तथा धार्मिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण भावना को देखते हुए गुरु रामदास जी ने 1581 में पांचवे गुरु के रूप में उन्हे गुरु गद्दी पर सुशोभित किया था। इस दौरान उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब का संपादन किया जो मानव जाती को सबसे बड़ी देन है। सम्पूर्ण मानवता में धार्मिक सुहारथ पैदा करने के लिए अपने गुरुओं की वाणी को जगह जगह से एकत्रित कर उसे धार्मिक ग्रन्थ में बाटकर कर परिष्कृत किया।

सच्ची शांति

एक समय की बात है, उन दिनों बाला और कृष्णा पंडित सुन्दर कथा करके लोगो को खुश किया करते थे, और सबके मन को शांति प्रदान करते थे। एक दिन वे गुरु अर्जन देव जी के दरबार में उपस्थित हुए और प्राथना करने लगे, महाराज हमारे मन में शांति नहीं है। आप ऐसा कोई उपाय बताये जिससे हमे शांति प्राप्त होगी। तब गुरु अर्जन देव जी ने कहा अगर आप मन की शांति चाहते है, तो जैसे आप लोगो को कहते है उसी प्रकार आप भी करो, अपनी कथनी पर अमल किया करो। परमात्मा को संग जान कर उसे याद रखा करो। अगर आप सिर्फ धन इक्कठा करने के लालच से कथा करोगे तो आपके मन को शांति  कदापि प्राप्त नहीं होगी। बल्कि आपके मन का लालच बढ़ता जायेगा और पहले से भी ज्यादा  दुखी हो जाओगे। अपने कथा करने के तरीके में बदलाव  कर निष्काम भाव से कथा करो तभी तुम्हारे मन में सच्ची शांति पैदा होगी।

गुरु अर्जन देव जी के विचार

एक अन्य प्रसंग के अनुसार एक दिन गद्दी पर बैठने के बाद गुरु अर्जन देव जी के मन में विचार  आया की सभी गुरुओं की बानी का संकलन कर एक ग्रन्थ बनाना चाहिये। जल्द ही उन्होंने इस विचार पर अमल करना शुरू किया। उस समय नानक बानी की मूल प्रति गुरु अर्जन जी के मामा मोहन जी के पास थी। उन्होंने वह प्रति लेन भाई गुरदास को मोहन जी के पास भेजा। मोहन जी ने प्रति देने से इनकार कर दिया।

गुरु जी का धैर्य 

इसके पश्चात गुरु अर्जन स्वयं उनके घर पहुंचे, सेवक ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। गुरुजी भी धुन के पक्के थे। वे द्वार पर ही बैठ कर अपने मामा से गा गा कर विनती करने लगे। इस पर मोहन जी ने उन्हें बहुत डांटा फटकारा और ध्यान करने चले गए। लेकिन गुरु जी पहले की तरह गाते रहे। अंततः उनके धैर्य विनम्रता और जिद्द को देख कर मोहन जी का दिल पसीजा और वे बहार आकर बोले बेटा नानक  बानी की मूल प्रति मैं तुम्हे दूंगा क्यूंकि तुम ही उसे लेने के सही पात्र हो।

ग्रंथ साहिब

इसके बाद गुरु अर्जन ने सभी गुरुओं की बानी और अन्य धर्मो के संतो के भजनो को संकलित कर एक ग्रन्थ बनाया जिसका नाम रखा ग्रंथ साहिब और उसे हर मंदिर में स्थापित करवाया। अपने ऐसे पवित्र वचनो से दुनिया को उपदेश देने वाले गुरु जी का मात्र 43 वर्ष का जीवन काल अत्यंत प्रेरणा दायी रहा। वे आध्यात्मिक चिंतक एवं उपदेशक के साथ ही समाज सुधारक भी थे। गुरु अर्जन देव जी ने “तेरा किया मीठा लागे”, और हरी नाम पदार्थ नानक मांगे सब्द का उच्चारण करते हुए सं 1606 में अमर शहीदी प्राप्त की। अपने जीवन काल में गुरु जी ने धर्म के नाम पर अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किया। आध्यात्मिक जगत में गुरुजी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

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