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श्री कृष्ण की मृत्यु (भाग-1)1 min read

श्री-कृष्ण-की-मृत्यु

श्री कृष्ण की मृत्यु

जो व्यक्ति इस धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु भी इसी प्रकार निश्चित थी। महाभारत की समाप्ति के साथ लगभग मनवा जाती का भी अंत हो चूका था। चारों ओर शवों के ढेर लगे हुए थे। युद्ध में विजय होने के बाद भी पांडव खुश नहीं थे। माता गांधारी दुर्योधन के मृत शरीर के पास बैठ कर विलाप कर रही थी और राजा धृतराष्ट्र पास ही खड़े थे। तभी श्री कृष्ण और पांडव अपना शोक व्यक्त करने और शमा प्रार्थी हो कर वहाँ पहुंच जाते है। श्री कृष्ण सहित पांडवों के आने की सुचना संजय धृतराष्ट्र और गांधारी को देते है।

 

गांधारी ने दिया था श्री कृष्ण की मृत्यु का श्राप;

महाभारत के परिणाम स्वरूप अपने १०० (100) पुत्रों की मृत्यु और वियोग से निराश और अतियंत क्रोधित गांधारी सीधे श्री कृष्ण से समक्ष जाती है। वह कृष्ण से कहती है की क्या आपको अपनी अलौकिक शक्ति और बल से इस महाविनाशी महाभारत युद्ध को रोकना नहीं चाहिए था? प्रतिदिन आपकी पूजा और आराधना करने के बाद भी अपने मेरे १०० (100) पुत्रों की रक्षा क्यों नहीं की?

गांधारी की यह बाते सुन कर श्री कृष्ण अपने आप को रोक नहीं पते और मुस्कुराने लगते है। श्री कृष्ण के इस तरह मुस्कुराने पर गांधारी और भी क्रोधित हो जाती और श्री कृष्ण से प्रश्न करती है की वह इस महाविनाश के बाद यूँ कैसे हँस सकते है? क्या उन्हें इस युद्ध में हुए विनाश और मृत्युओं का ज़रा भी खेद नहीं? अपने इसी क्रोध में गांधारी कहती है की हे कृष्ण! यदि मैंने अपने पतिधर्म का पालन पूरी निष्ठा से किया है और यदि मेरी विष्णु भक्ति सच्ची थी तो आज से ३६ (36) वर्ष के बाद तुम्हे मृत्यु प्राप्त होगी। तुम्हारी द्वारका नगरी जाल में विलीन हो जाएगी और जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी तरह तुम्हारे कुल का भी आपस में लड़ कर सर्वनाश हो जाएगा। यह बोलते बोलते गांधारी रोने लगती है और श्री कृष्ण के चरणों में गिर जाती है। श्री कृष्ण उन्हें उठाते है और यह कहते है की माते आपका यह श्राप आपके पतिव्रत और भक्ति के कारण ही नहीं परन्तु सयम चक्र के कारण भी फलदाई होगा।

गांधारी-ने-दिया-था-श्री-कृष्ण-की-मृत्यु-का-श्राप

सयम बीतने लगा। युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राजपाठ संभाल लिया था और श्री कृष्ण अपनी द्वारका नगरी चले गए थे। श्री कृष्ण यह जानते थे की अगर यादवों के वंश का नाश नहीं हुआ तो वह धरती पर भोज बन जाएंगे और वह यह भी जानते थे की उनके होते हुए उनके सम्बन्धियों को कोई हानि नहीं पंहुचा सकता। इसलिए जब गांधारी उन्हें श्राप देती है तो वो इस बात से खुश थे की गांधारी ने उनकी समस्या का समाधान कर दिया है। जैसे जैसे सयम बीत रहा था, द्वारका नगरी में यादव अनंत आनंद में दुब रहे थे। वह अपने इस आनंद में इतने मग्न हो गए की वह अपने शुद्ध आचरण, नैतिकता, अनुशासन और विनम्र स्वभाव के महत्व को भी भूल गए।

श्री कृष्ण की अष्टभार्य में से एक थी जाम्बवती। श्री कृष्ण और जाम्बवती के पुत्र का नाम साम्ब था। यादव वंश का अंत और गांधारी का श्राप साम्ब के द्वारा ही पूर्ण हुआ था। ऋषियों के श्राप से ही साम्ब बने थे यदु वंश के अंत का कारण।

 

साम्ब को ऋषियों का श्राप।

बात उस समय की है जब ऋषि विश्वामित्र, ऋषि दुर्वासा, ऋषि वशिष्ट और नारद सहित अन्य ऋषि अपनी तीर्थ यात्रा के दौरान श्री कृष्ण और बलराम से मिलने द्वारका नगरी आते है। यादवों का एक समूह जिसमें भोडक, वृष्णि, कैकेय और आन्दाक सम्मिलित थे, वह सभी अपनी अनुशासन और संस्कृति की भावना भूल चुके थे। जब इस युवकों के समहू ने ऋषियों को देखा तो उन्हें एक शरारत सूझी और उन्होंने ऋषियों की शक्ति परखने का निर्णय लिया।

साम्बा-को-ऋषियों-का-श्राप

साम्ब ने एक स्त्री का रूप लिया और पेट पर बहुत सारे कपडे बांध दिए जिस से ऐसा लग रहा थे की वो गर्भवती है। अपने साथियों के साथ साम्ब इसी भेस में ऋषियों से समक्ष जाता और उसके मित्र ऋषियों से यह से पूछते है की इस स्त्री को पुत्र होगा या पुत्री? ऋषियों को अपनी दिव्य दृष्टि से यह ज्ञात होता है की यह सब एक स्वांग है तो वह क्रोधित हो जाते है और साम्ब को यह श्राप देते है की वह पुत्र या पुत्री को नहीं बल्कि लोहे की मुसल को जन्म देगा और उसी लोहे की मुसल से यादव वंश का अंत होगा। यह सुन कर सभी हैरान हो गए परन्तु फिर भी अपने अभिमान के कारण उन्हीने ऋषियों से माफ़ी नहीं मांगी और हस्ते हर वहां से चले गए तथा ऋषियों के श्राप को नज़रअंदाज़ कर दिया। किन्तु सात दिन बाद साम्ब को प्रसव पीड़ा होने लगी और उसने एक लोहे की मुसल को जन्म दिया। ऋषियों के श्राप का भय अब सभी को सताने लगा था। यह तुरंत से उस लोहे की मुसल को ले कर अक्रूर जी और उग्रसेन जी के पास जाते है और श्री कृष्ण की उपस्तिथि में सारा घटना कर्म सुनते है।

अक्रूर जी उन्हें यह आदेश देते है की उस लोहे की मुसल को पीस कर समुद्र में फेंक दें। अक्रूर जी श्री कृष्ण की ओर देखते है तब श्री कृष्ण अक्रूर जी को यह कहते है की समय का पहिया घूम है और साम्ब में अपना कर्म पूर्ण किया है।

बाकि सभी उस आदेश का पालन करते है और उस गांठ को पीसते है परन्तु लोहे का एक तिकोना भाग रह जाता है। वह उस पीसी हुई लोहे की मुसल और बचे हुए भाग को समुद्र में फेंक देते है। साम्ब सहित सभी यादव खुश हो जाते है की उन्होंने बड़ी आसानी से ऋषियों का श्राप विफल कर दिया है।

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