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भगवान कृष्ण की 5 शिक्षाएं1 min read

भगवान कृष्ण की 5 शिक्षाएं

भगवान कृष्ण

1.सबसे बड़ी कमज़ोरी

भगवान कृष्ण कहते हैं की मनुष्य की सबसे बड़ी कमज़ोरी न तो धन है न प्रेम है न ही अहंकार। मनुष्य की सबसे बड़ी कमज़ोरी है उसके रहस्य। चाहे मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसके रहस्य ही उसके नाश की चाबी  होते हैं। जैसे रावण बहुत शक्तिशाली था परन्तु विभीषण को उसके अमृतकुंड का ज्ञान था इसलिए भगवान राम उसका वध करने में सफल हुए। इसलिए अपने रहस्य किसी को भी न बताएं न शत्रु को न मित्र को समय आने पर आपका मित्र भी आपका सबसे बड़ा शत्रु बन सकता है। अपने रहस्य को स्वयं तक ही सिमित रखें।

2.न करें नक़ल

मनुष्या जीवन में सफलता पाने के लिए हर संभव प्रयास करता है। वह परिश्रम करता है इधर उधर दौड़भाग करता है और इससे भी जब उसका काम नहीं बनता तो वह नक़ल करता है। आपने देखा होगा स्कूल में जब परीक्षा होती थी तो बच्चे नक़ल किया करते हैं और वे परीक्षा में पास हो जाते हैं।

लेकिन जीवन की परीक्षा में ऐसा नहीं होता। भगवान कृष्ण कहते हैं, नक़ल करने वाला हमेशा असफल ही होता है इसके पीछे कारण यह है की जीवन की परीक्षा में सभी के प्रश्नपत्र अलग होते हैं। और अगर प्रश्नपत्र अलग हैं तो उनके उत्तर भी अलग ही होंगे। इसलिए अगर आपको जीवन की परीक्षा में सफल होना है हो आप किसी की नक़ल न करें।

3.सफलता और असफलता

मनुष्य का जीवन हमेशा ही सफलता और असफलता, हार और जीत के बीच झूलता रहता है। जब आप सफल होते हैं, किसी चुनौती पर विजय पाते हैं तब आप बहुत खुश होते हैं और जब किसी कारणवश आपको असफलता का सामना करना पड़े तो आप बहुत दुखी होते हैं।

लेकिन भगवान कृष्ण कहते हैं ,वास्तव में सफलता और असफलता और कुछ नहीं बस हमारी मन की स्थिति है। हमारी हार तब नहीं होती जब हमारा दुश्मन हमें हराए, हमारी हार तब होती है जब हम खुद उस हार को स्वीकार कर लेते हैं। हम असफल तब नहीं होते जब हमें हमारी मज़िल न मिले, हम असफल तब होते हैं जब हम प्रयास करना छोड़ देते हैं। जिस दिन आप हार स्वीकारना छोड़ देंगे जीत आपके क़दमों में होगी।

4.अधिक बोलना हानिकारक है

मनुष्य का शरीर प्रकृति का एक बहुत बड़ा आविष्कार है। इससे जटिल संरचना पूरे संसार में कोई नहीं। लेकिन इसे ठीक से जाना जाए तो इससे सरल ज्ञान देने वाला और कोई नहीं। हमारे शरीर में पांच इन्द्रियां होती हैं। जो हमें भाव गुण और वस्तुओं का ज्ञान करवाती हैं।

मनुष्य के शरीर में आँख है, नाक है, कान हैं, त्वचा है और जीभ है। सबके अलग अलग काम हैं। आखों से देखना, कानों से सुनना, नाक से स्वास लेना, त्वचा से स्पर्श करना और जीभ से स्वाद चखना। क्या अपने कभी गौर किया है कि हमारे शरीर में दो आखें और दो कान हैं परन्तु जीभ एक है ऐसा क्यों? क्योकि प्रकृति चाहती है कि हम सुनें ज़ायदा देखें ज़ायदा परन्तु बोले कम। क्योकि ज़ायदा बोलना हानिकारक है।

5.अपनों की पहचान

सभी हमेशा यही कहते आये हैं कि अगर आगे बढ़ना है तो अपनों का साथ दो। सत्य कहते हैं! अपनों का साथ देना ही चाहिए। लेकिन साथ देने से पहले यह ज़रूर पहचान लेना चाहिए कि अपने हैं कौन? क्या अपने वह होते हैं जिनका हमारे साथ रक्त सम्बन्ध होता है या अपने मित्र?

अपने वही होते हैं जो हमें हमेशा अच्छे कामों के लिए प्रेरणा देते हैं, हमें आगे बढ़ाते हैं, हमारा साथ देते हैं। और जिनका साथ देने से समाज का नाश हो या धर्म की हानि हो वह अपने हो कर भी अपने नहीं होते। इसीलिए जब भी अपनों का चुनाव करें तो ऐसे लोगों को अपना मानें जो आपका साथ दें आपको सही रास्ता दिखाएं, उन्हें नहीं जो हमें गलत मार्ग पर ले जाएँ।

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