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नंदी कैसे बने भगवन शिव के वाहन?1 min read

नंदी

नंदी कैसे बने भगवन शिव के वाहन?

भगवान शिव का नाम सुन कर हमें माँ पारवती, उनकी जटाओं से निकलती हुयी गंगा, उनके गले का सर्प यह सब याद आता है और इसके साथ उनका वाहन नंदी भी याद आता है। नंदी भगवान शिव के वाहन हैं और वे सदैव भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। क्या आप जानते हैं कि नंदी भगवान शिव के वाहन कैसे बने?

यह है नंदी के भगवान शिव के वाहन बनने की कथा:

बहुत समय पहले की बात है, शीलधर नाम के एक ऋषि थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की चाह में उन्होंने भगवान शिव की आराधना करने का निर्णय लिया। उन्होंने कई सालों तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव स्वयं प्रसन्न हुए। उन्होंने शीलधर से कहा, पुत्र मैं तुम्हारे इस कठोर तप से बेहद प्रसन्न हूँ। बताओ तुम्हें क्या वर चाहिए। शीलधर ने भगवान शिव को प्रणाम किया और बोले प्रभु मेरी बस एक ही कामना है कि मुझे एक पुत्र चाहिए। शिव जी बोले, तुम्हारी यह कामना अवश्य पूरी होगी। यह कह कर भगवान शिव अदृश्य हो गए।

भगवान शिव की बात सुनकर बहुत खुश हुए। वह जानते थे कि भगवान शिव उसकी मनोकामना को जल्द ही पूरा करेंगे। अगले ही दिन जब वह खेत में गए और खुदाई करने लगे तो खुदाई करते-करते उन्हें एक सुन्दर-सा बालक हल के नीचे पाया। उस बालक पर सोने सा तेज था। शीलधर बच्चे को देख रहा था। तभी एक आकाशवाणी हुयी, शिलाधर इस बच्चे को उठाओ और अच्छी तरह देखभाल करो।

शिलाधर उसको घरले गया और उसका नाम नन्दी रखा। नंदी बहुत होशियार और तीव्र बुद्धि वाला बालक था। शिलाधर नंदी पर बहुत गर्व महसूस करते थे। कुछ समय बाद दो ऋषि मित्र और वरुण शिलाधर के घर आये। शिलाधर ने उनसे कहा हे महान ऋषि! आपका स्वागत है। कृपया बैठिये और आराम कीजिये। शिलाधर ने अपने बेटे को बुलाया और कहा नंदी तुम्हारा कर्तव्य है कि इन् दोनों ऋषियों कि सेवा में कोई कसर न रहे। नंदी मुस्कुरा कर बोला जी पिताजी। नंदी ने उन दोनों ऋषियों कि बहुत सेवा की।

अपनी आगे की यात्रा को जारी रखने के लिए दोनों ऋषियों ने आश्रम छोड़ने का निर्णय लिया। आश्रम छोड़ कर जाते हुए ऋषियों से शिलाधर और नंदी ने आशीर्वाद माँगा। पहले मित्र और वरुण ऋषि ने शिलाधर को आशीर्वाद देते हुए कहा, शिलाधर तुमने हमारी बहुत सेवा की है। खुश रहो! जब नंदी ऋषियों के पैर छूने लगे तो दोनों ऋषि गंभीर थे। वह बोले, बेटा अपने माता पिता और गुरू जी का ध्यान रखना।

यह कह कर वे दोनों चले गए। शिलाधर ने उनके हाव भाव को देखा और उनके पीछे पीछे चल दिये। कुछ दूर जा कर उसने बोले ऋषिजी रुकिए। फिर उन्होंने ऋषियों से पूछा आप मेरे बेटे को आशीर्वाद देते हुए गंभीर और परेशान लग रहे थे, कुछ हुआ है क्या? तब मित्र ऋषि ने शिलाधर की ओर देखा और कहा, मैं आपके बेटे की लम्बी उम्र की कामना नहीं कर सकता। शिलाधर परेशान हो गये और बोले मेरे बेटे के साथ क्या होने वाला है? मित्र ऋषि बोले, शिलाधर आपके बेटे नंदी के पास लम्बा जीवन नहीं है। यह बात मुझे आप तक पहुंचाने का खेद है।

शिलाधर यह सुन कर बहुत दुखी और परेशान हो गये। काफी समय भर बिताने के बाद वह वापस घर गए। जब नंदी ने शिलाधर को देखा तो वह समझ गए कि कोई न कोई बात तो ज़रूर है। क्या हुआ पिताजी? नंदी ने शिलाधर से पुछा। फिर शीलधर ने ऋषियों की कही गयी बातें नंदी को बताई उन्हें लगा नंदी रोने लगेगा या डर जायेगा।

पर नंदी हसने लगा और बोला पिताजी आप उन ऋषियों की बात से डर गए। आपने मुझे बताया है ना कि आपने साक्षात भगवान शिव को देखा है। उसने भक्ति भाव से कहा। पिताजी अगर मेरे भाग्य में मरना लिखा है तो भगवान शिव उसे बदल सकते हैं। वह बहुत शक्तिशाली हैं और कुछ भी कर सकते हैं। अगर आप और मैं उनकी पूजा करेंगे तो क्या हमारे साथ कुछ भी गलत हो सकता है? मुझे नहीं लगता पिताजी!

नंदी अपने पिता कि ओर देख कर बोला। फिर उसने अपने पिता के चरण छुए और आशीर्वाद लेकर तपस्या करने चल दिया। नंदी वना नदी के पास गया और उसने तप करना शुरू कर दिया। नंदी की एकाग्रता और भक्ति देख भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसे दर्शन दिए।

भगवन शिव ने नंदी से बोला, बेटा नंदी आखें खोलो! जब नंदी ने अपनी आखें खोली तो उसने देखा की उसके सामने एक सुन्दर व्यक्ति खड़ा है। उन्हें देख कर उसके मैं में कोई प्रश्न ना बचा उसने सोचा की कितना अच्छा हो अगर मैं इनके साथ रह सकू। भगवान शिव बोले, नंदी तुम्हारी तपस्या देख मैं बहुत प्रसन्न हुआ मांगो जो माँगना चाहते हो! नंदी ने कहा भगवान क्या मैं हमेशा आपके साथ रह सकता हूँ?

शिव जी मुस्कुरा दिए और फिर बोले मैंने अपना बैल खोल दिया है जिसपर मैं यात्रा करता था। आज से तुम्हारा चेहरा बैल सा होगा और तुम कैलाश में मेरे साथ रहोगे। तुम आज से मेरे गणो के मुखिया होगे, मेरे वाहन होगे और मेरे सबसे अच्छे दोस्त भी! नंदी की आखों में आँसू आ आ गये। भगवान शिव ने उसकी सारी इच्छाएं पूरी कर दीं। तभी से नंदी भगवान शिव के वाहन बने।

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