केदारनाथ-kedarnath1 min read

केदारनाथ-मंदिर

केदारनाथ (Kedarnath)

हिंदी धर्म के पुराणों के अनुसार शिव भगवान ने प्रकर्ति के कलिआण हेतु भारत वर्ष में 12 जगहों में ज्योतिर्लिंग क रूप में प्रकट हुए, उन 12 जगहों में स्तिथ शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है जिनमे से एक ज्योतिर्लिंग केदारनाथ है, यह चार धाम एवं पंच केदारों में से एक है। पंच केदारों में केदारनाथ,रुद्रनाथ, कल्पेशवर, मदयेश्वर, तुंगनाथ इनमें शामिल हैं। केदारनाथ मन्दिर भारत क उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्तिथ हैं।उत्तराखण्ड में हिमालय की गोद में स्तिथ केदारनाथ के कपाट शर्धालुओ के लिए 6 माह के लिए खुलते हैं और सर्दियों सर्दियों में भारी बरफबारियो के बाद यहां आने का रास्ता बंद हो जाता हैं। केदारनाथ धाम में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं,इस धाम के प्रति लोगो की अटूट श्रद्धा और विश्वास हैं, केदारनाथ मंदिर तीनों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ हैं, एक तरह 22,000 फुट लम्बा केदरनाथ पर्वत हैं तोह दूसरी तरफ 21,600 फुट ऊंचा और तीसरी तरफ 22,000 फुट ऊँचा भारत। ना सिर्फ 3 पर्वत बल्कि 5 नदियों का संगम भी यहां पर माना जाता ह, जिनमे की 5 नदिया मन्दाकिनी, चिरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी इनमें शामिल ह, इन् नदियो म से कुछ को काल्पनिक माना जाता हैं, इस इलाके में मन्दाकिनी ही आम तौर पर दिखायी देती हैं। मन्दाकिनी नदी का उद्गम स्थान चोरी गौरि ग्लेशियर का कुण्ड हैं मन्दाकिनी नदी के पास ही केदारनाथ मंदिर का निर्माण कराया गया था। केदारनाथ मंदिर के निर्मा को लेकर कई बातें कही गयी हैं।

केदारनाथ मंदिर का इतिहास

इससे 1000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना माना जाता ह। यह भी कहा जाता हैं की इस मंदिर का निर्माण पांडवों के वंशज ग्वालियर से मिली राजा भोज के अनुसार मालवा के राजा भोज ने केदारनाथ के मंदिर को बनवाया था। एक प्रचलित मान्यता क अनुसार मंदिर का जारनौधार गुरा अदि शंकराचार्य जी ने आठवीं शताब्दी में करवाया था। 32 वर्ष की आयु में सुन 820 सदी में केदारनाथ के समीप उनकी मिर्तुयु हुई। मंदिर के पिछले भाग में जगत गुरु शंकराचार्य जी की समाधि भी हैं। केदारनाथ मंदिर को लेकर दो कथाएँ प्रसीद ह।

प्रसिद्ध कथाये

पहली कथा के अनुसार केदार के अनुसार केदार के शिकार पे भगवन विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि यहा पे तपस्या करते थे, उनकी आराधना से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी प्राथना के अनुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां सदा वास करने का वचन दिया। दूसरी कहानी के अनुसार माना जाता हैं की महाभारत के युध्य जीतने के बाद पांडवो पे भरतीये हत्या का पाप यानि कि परिवार के सदस्यों की हत्या का पाप था था जिसकी वजह से पड़ाव इन् पापो से मुक्त होना चाहते थे और भगवन शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे। भगवान् शिव पांडवो की इस भ्रातिये हत्या से नाराज थे, भगवन शिव के दर्शन के लिए पांडव काशी गए परन्तु भगवन शिव उन्हें वहां नहीं मिले। पांडवा भगवान् शिव को ढूंढ़ते ढूंढ़ते हिमालय तक आ पहुंचे। भगवन शिव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे इसलिए वे वहां से अन्तर्ध्यान हुई और केदारनाथ जा पहुँचे। दूसरी तरफ पांडव भी अपनी लगन क पाके थे और भगवन शिव का पीछा करते करते वे भी केदार पहुँच गये। भगवन शिव ने तब बेल का रूप धारण किया और पशुओ क झुण्ड में जेक मिल गये। पांडवों को इस बात का संदेह हो गया था, तभी भीम ने अपना विशालतम रूप धारण करके दोनों पहाड़ो पे अपने पैर फैला दिया, यह सब देखकर सभी गए बेल तो भीम के पैर के नीचे से निकल गए लेकिन बेल के रूप में शिव जी भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम ने अपने बल से बेल को पकड़ा तभी बेल धरती में समाने लगा,तब भीम ने बैल की पीठ का भाग पकड़ लिया, भगवान शंकर पांडवों की भक्ति और दृढ़संकल्प को देख कर बहुत खुश हुए उन्होंने उसी समय दर्शन देकर पांडवों को श्राप से मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवन शिव बैल की पीठ की आकर्ति पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा भी माना जाता हैं की जब भगवान् शिव बेल के रूप में अंतर्ध्यान हुए तोह उनके धरह के ऊपर का भाग काठमांडू में प्रकट हुआ अब वह पशुपति नाथ का प्रसीद मंदिर हैं। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मच रुद्रनाथ, नाभि मंधेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुई ।

शिव-जी-केदारनाथ

केदारनाथ मंदिर की बनावट

इस लिए इन् चार स्थानों सहित केदारनाथ को पञ्च केदार जाता हैं। यह शिव जी के भव्य मंदिर बने हुए हैं, केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊँचा और 187 फ़ीट चौरा हैं। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी हैं और बेहद मजबूत पथरो से बनाई गई हैं। विश्व प्रसिद्द केदारनाथ मंदिर 3462 मीटर की ऊंचाई पर स्तिथत हैं। यह मंदिर एक 6 फ़ीट ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ ह। यह हैरत अंगेज करने वाली बात हैं की इतने भरी पथरो को इतनी ऊंचाई पर लाकर, तराश कर किस प्रकार से मंदिर बनाया गया होगा। जानकारों का मानना हैं की पथरो को एक दूसरे से जोड़ने क लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को बीचों बीच खड़े रहने में कायम बनती हैं। मंदिर के मुख्या भाग में मन्द और वक्रा के चारों तरफ प्रदक्षिणा प्राथ हैं। मंदिर के बहार नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। श्री केदारनाथ मंदिर पर उपस्थित श्री मुखी कलश भीतर से मोटी ताम धातु तथा बाहर से स्वर्ण धातु का बनाया गया था, जो की वर्तमान समय में मंदिर म उपस्थित नही ह, क्युकी कुछ वर्ष पूर्व वह दिव्या कलश मनुष्य की लालच की भेंट चढ़ गया,और वर्त्तमान में उस कलश के स्थान में जमलोकी श्रेणी का कलश स्तापित करा गया हैं। मंदिर के प्रांगण में द्रौपदी समेत पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियां हैं। मंदिर के ग्रापग्रह में नोकीले चेतन भगवन शिव के सदाशिव के रूप में पूजी जाती हैं।

केदारनाथ मंदिर के द्वार कब खुलते हैं

केदारनाथ मंदिर के कपाट संक्रांति से 15 दिन पहले खुलते ह और अगहन संक्रांति की निकट बलराज की रात को यहां पूजा की जाती ह। भैया दूज क दिन सुबह 4 बजे श्री केदार को घृत कमल आदि की सामग्री क साथ ही कपाट बंद हो जाते ह। केदारनाथ के कपाट बंद हो जाने के बाद केदारनाथ की पञ्च मुखी प्रतिमा को मुख्य मठ लाया जाता हैं। इस प्रतिमा की पूजा यहा रावल जी करते हैं।

केदारनाथ मंदिर की भव्यता

जून 2013 में उत्तराखंड और हिमाचल में अचानक ही बाद आ गयी, जिससे सबसे अधिक प्रभावित केदारनाथ धाम हुआ। यह आपदा इतनी भायक हो गयी थी कि इसके आस पास बने होटल, धर्मशाला आपदा अपने साथ बहाकर ले गई लेकिन इस ऐतिहासिक मंदिर का मुख्य हिस्सा शुरक्षित रहा। प्रलय के बाद भी मंदिर का उसी भव्यता के साथ खड़े रहना किसी आस्चर्य से कम नहीं है। आज भी लोग इसे किसी चमकतार से कम नहीं मानते। बाद के बाढ़ बड़ी बड़ी चट्टानों मंदिर के पास आने लगी और वही रुक गयी जो अभी तक जस की तस हैं लेकिन उसी में से एक चट्टान भी आई जो मंदिर का कवच बन गयी। इस चेतन की वजह से मंदिर की एक ईंट को भी नुकसान नही पंहुचा जिसके बाद इस चट्टान को भीमशिला का नाम दिया गया। यह चट्टान मंदिर के प्रज्ञा मार्ग के बिलकुल पीछे हैं। केदारनाथ का मंदिर आम दरशालियो के लिए सुबह 6 बजे खुलते हैं, दोपहर 3-5 यहां विशेष पूजा होती हैं और उसके बाद विश्राम के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है और पुनः 5 बजे भक्तो के दर्शन के लिए यह मंदिर खोला जाता ह। भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करने क बाद 7:30 बजे से लेकर 8:30 बजे तक हर रोज यहां आरती की जाती हैं, रात को 8:30 बजे के बाद श्री केदारनाथ का मंदिर बंद कर दिया जाता है। केदारनाथ पहुंचने के लिए ृदुरप्रयाग से गौरी कुंड तक का सफर तय करना होता है।

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