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कामाख्या देवी मंदिर1 min read

कामाख्या देवी मंदिर

हिंदू धर्म के अनुसार देवी दुर्गा (जिन्हे शक्ति या माँ अम्बे भी कहा जाता है), के कई रूप और अवतारों को पूजा जाता है ।  हर रूप की अपनी दिव्य मान्यता है । वैष्णो देवी, चामुंडा देवी, मनसा देवी,ज्वाला जी, कामाख्या देवी, माँ दुर्गा के कुछ प्रसिद्ध मंदिर है ।  हर मंदिर की अपनी एक अलग पौराणिक कहानी है।

देवी के कई मंदिरों को शक्ति पीठ के नाम से भी जाना जाता है। इन्हे शक्ति पीठ बोले जाने का सम्भन्ध प्राचीन काल की एक कहानी से है।

कहानी कुछ इस प्रकार है की जब माता सती के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया तो माता सती और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था।क्यूंकि वो अपनी पुत्री (माता सती)और भगवान शिव के विवहा से खुश नहीं थे। भगवान शिव के मना करने पर भी माता सती अपने पिता के घर आयोजित यज्ञ में बिना निमंत्रण के ही पहुंच गयी। वहा पहुंचने पर, उन्हें भगवान शिव के प्रति अपमानजनक बातें सुनाई गयी तो वह क्रोधित हो उठी। जब उन से यह बर्दाश नहीं हुआ तो उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपनी आहुति दे दी।

जब भगवान शिव को पता चला तो वह अतियंत क्रोध में दक्ष के निवास पर पहुंचे। माता सती को इस स्तिथि में देख कर वह अपने रूद्र रूप में तांडव करने लगे। उन्होंने माता को अपने कंधे पर उठा लिया था। भगवान विष्णु ने शिव जी का क्रोध कम करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर का विभाजन कर दिया। तांडव करते समय जहाँ जहाँ माता के अंग गिरे उन्हें शक्ति पीठ कहा गया है। माता सती के ५१ (51) शक्ति पीठ है।

उन्ही ५१(51) शक्ति पीठों में से एक है माँ कामाख्या देवी का मंदिर।

 

कामाख्या-देवी-मंदिर-मूर्तिकामाख्या देवी मंदिर की एक प्रतिमा

 

यह मंदिर असम के पश्चिमी गुवाहाटी में  मौजूद नीलाचल पर्वत से १०किलोमेटेर (10 kilometer) दूर है। यह मंदिर बहुत ही दिव्य और इसका तांत्रिक महत्व भी काफी ज़्यादा है। पुराणों के अनुसार यहाँ माता सती की योनि  का भाग गिरा था, जिस से इसे शक्ति पीठ की उपाधि मिली है। कहा जाता है यहाँ माता की महामुद्रा(योनि) होने के कारण माता रजस्वला भी होती है। आश्चर्या की बात यह है की मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं है, केवल पत्थर की एक चद्दर है जो निचे की ओर ढलान में होने की वजह से योनि के आकर की लगती है। यह करीब १० इंच (10 inch) गहरी है और भूमिगत झरने के कारण यह हमेशा नम रहती है। लोगो का कहना है की हर साल बारिश के महीने में जो कि जून में शुरू होता है, इसी दौरान माता कमख्या रजस्वला होती है। हर वर्ष यह समय अम्बुबाची पर्व/ अम्बुबाची मेला के रूप में मनाया जाता है।

 

अम्बुबाची मेला;

खामख्या देवी हर वर्ष जून के महीने में रजस्वला होती है। यह तीन दिन तक चलता है। इन तीन दिनों के लिए मंदिर के पट बंद रहते है और कोई शुभ काम नहीं किये जाते। माता को दी जाने वाली बलि भी तीन दिन के लिए रोक दी जाती है। अम्बुबाची मेला तांत्रिक साधनाओं से खास तौर पर जुड़ा हुआ है। अम्बुबाची मेले के दौरान देश भर से साधु, तांत्रिक इत्यादि कामख्या देवी के धाम आते है। तीन दिन तक मंदिर के पट बंद रहने के बाद चौथे दिन माता को स्नान करवाया जाता है और उसके पश्च्यात मंदिर के पट पुनः खोल दिए जाते है। आस्था रखने वाले लोग मानते है के माता के रजस्वला होने से ब्रह्मपुत्रा नदी का जल भी लाल हो जाता है।

 

कामाख्या-देवी-मंदिर-अम्बुबाची-मेलाकामाख्या देवी मंदिर में होने वाले अम्बुबाची मेले में आए श्रद्धालु

मंदिर से मिलने वाला प्रसाद;

कामाख्या मंदिर में मिलने वाला प्रसाद बाकि मंदिरों के प्रसाद से अलग है। अम्बुबाची मेले के बाद प्रसाद में लाल रंग के कपडे का टुकड़ा दिया  जाता है। जिसे अम्बुबाची कपडा कहा जाता है। माता के रजस्वला होने से पहले एक सफ़ेद कपडा गर्भगृह में रखा जाता है। तीन दिन बाद जब पट खोले जाते है तो वही कपडा लाल हो जाता है। यही कपडा प्रसाद में दिया जाता है। योनि कुंड से प्रवाहित होने वाला जल भी प्रसाद के तोर पर दिया जाता है।

मंदिर के बारे में तथ्य;

  1. कामाख्या देवी मंदिर में कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है, केवल योनि के आकर में एक पत्थर की चद्दर है जिसकी पूजा की जाती है।
  2. मंदिर में प्रवेश करने से पहले भगवान गणेश से मन्त्र उच्चारण करके अनुमति लेनी होती है। गणेश मंदिर मुख्य मंदिर के बहार ही है।
  3. माता के दर्शन से पहले भक्त अपने आप को शुद्ध करने के लिए सुभाग्य कुंड से अपने ऊपर जल डालते है।
  4. गर्भग्रह में मौजूद योनि कुंड से जाल अपने आप प्रवाहित होता है और यह कुंड कपडे और फूलों से ढाका रहता है।
  5. मंदिर का गर्भगृह तल से २० फ़ीट(20 feet) निचे है।

मंदिर में आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना के लिए मंदिर के घंटी बांधते है।कामाख्या देवी

 

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