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श्री कृष्ण की महारास के लिए महादेव ने लिया गोपेश्वर महादेव का रूप1 min read

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श्री कृष्ण की महारास;

हिन्दू धर्म में देवों के देव महादेव के कई रूपों को पूजा जाता है। उन्ही में से एक है, श्री गोपेश्वर महादेव। आखिर क्यों लिया महादेव ने गोपी का रूप? यह बहुत ही दलिचस्प घटना पर आधारित है।

यह घटना द्वापर युग की है, जब भगवान विष्णु श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे। श्री कृष्ण का अवतार जन कल्याण व लोगो के राजा कंस के अत्याचरों से मुक्त करने के लिए हुआ था। सभी जानते है की श्री कृष्ण की लीला अपरम्पार है। श्री कृष्ण की लीलाओं में से सबसे मनमोहक और सुन्दर लीला है, राधा और सारी गोपियों के साथ की गयी रास लीला या महारास है। यह महारास इतनी मनमोहक, दिव्य, सुन्दर और पवित्र थी की तीनों लोको में रास की ख्याति फैली हुई थी। महारास में श्री कृष्ण, राधा और गोपियाँ साथ में नृत्य किया करते थे। महारास की खास बात यह थी की रास के समय केवल एक ही पुरुष, जो श्री कृष्ण है, ही जा सकते थे। अन्य किसी भी पुरुष को रास में भाग लेने की इजाज़त नहीं थी।

पूर्णिमा की रात, यमुना के तट पर जब श्री कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते थे, तब राधा और उनकी सखियाँ मंत्र्मुक्ध हो कर झूम उठती थी। बांसुरी की मीठी धुन तीनों लोको में सुनाई देती थी।

श्री कृष्ण और गोपेश्वर महादेव की कहानी;

एक बार जब महारास के समय श्री कृष्ण ने बांसुरी बजाई, जब वह धुन कैलाश पर ध्यान में विलीन महादेव के कानो में पड़ी तो उनका ध्यान भी भंग हो गया। वो मधुर धुन सुन कर उन्होंने महारास में जाने की इच्छा पारवती जी को बताई। तब पारवती जी ने उन्हें बताया की वह वहाँ नहीं जा सकते, क्यूंकि वो मोहन यानि श्री कृष्णा की सीमा है और कोई भी दूसरा पुरुष वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। परन्तु महादेव उनकी बात नहीं सुनते और महारास में भाग लेने के लिए श्री कृष्ण के पराम् भक्त आसुरी मुनि, पारवती जी, नंदी जी, गणेश जी और कार्तिकेय जी को ले कर वृंदावन चले गए। वृंदावन में यमुना तट पर पारवती जी तो वंशीवट में प्रवेश कर गयी। परन्तु महादेव, आसुरी मुनि, नंदी जी, गणेश जी और कार्तिकेय को अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली। द्वार पर खड़ी द्वारपालिकाओं ने उन्हें वही बताया जो पारवती जी ने बताया था की “श्री कृष्ण के अतिरिक्त किसी भी पुरुष को अंदर जाने की अनुमती नहीं है”। तब महादेव ने उन से बोला की वह श्री कृष्ण और राधा रानी के इस दिव्य महारास के दर्शन करने के लिए आतुर है। तभी द्वार पर खड़ी सखियों में से ललिता सखी ने उन्हें यह सुझाव दिया की,”मानसरोवर में स्नान करके गोपी का रूप धारण करके आप महारास में शामिल हो सकते है”।

महादेव ने यह सुनते ही मानसरोवर में स्नान किया और अर्धनारीश्वर अब पूर्ण नारी रूप में आ चुके थे। स्वयं यमुना जी महादेव के इस नारी रूप का श्रृंगार किया था; माथे पर बिंदी, हाथ में चूड़ियां, पैरों में पायल, सर पर ओढ़नी, और एक हाथ लम्बा घूँघट और साथ ही महादेव के कान के युगल मंत्र का उपदेश भी दिया।

इस नारी रूप में आ कर उन्हें भी महारास में जाने दिया गया।

श्री कृष्ण के संग राधा जी और बाकि सभी सखियों को मंत्र्मुक्ध नृत्य करता देख कर खुद महादेव भी छम छम नाचने लगे। नाचते नाचते जब वह भगवान श्री कृष्ण के पास पहुंचे तो श्री कृष्ण ने उन्हें पहचान लिया और सोचा की थोड़े हंसी ठठे से महारास का आनंद दुगना हो जाएगा। श्री कृष्ण सभी गोपियों से बोले की ”में तुम्हरे साथ इतनी देर से नाच रहा हूँ परंतु मेने अभी तक तुम्हारे चेहरे नहीं देखे”। इस पर सखियाँ बोली की ”तुम से क्या छिपा है मोहन , तुम देख लो हुम्हारा चेहरा”। महादेव यह सोच रहे थे की महारास के बीच में यह करने के क्या ज़रूरत थी।

सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गए। महादेव यह सोच कर अनंत में खड़े हो गए की इतनी सारी गोपियाँ है, अनंत तक आते आते कृष्ण थक जाएंगे और महादेव चेहरा दिखाने से बच जाएंगे। पर श्री कृष्ण तो सर्व ज्ञानी है। उन्होंने ने अनंत की ओर देखते हुए बोलै की मैं यह से शुरू करूँगा। श्री कृष्ण का इतना बोलना ही हुआ था की महादेव दूसरी ओर भागने लगे। तभी श्री कृष्ण सभी गोपियों से बोले की यह गोपी जो इतना शर्मा रही है,मैं सबसे पहले इसका मुख देखूंगा और दौड़ कर महादेव का हाथ पकड़ लिया। श्री कृष्ण ने उनका घूँघट उठा कर बोले ”आइये गोपेश्वर महादेव! आपकी जय हो!

राधा रानी समेत सभी गोपियाँ आश्चर्य में पड़ गयी। तब श्री कृष्ण ने उन्हें बताया की यह कोई साधारण गोपी नहीं बल्कि सवयं महादेव है और हमारी महारास देखने के लिए उन्होंने गोपी का रूप लिया है।

राधा रानी ने हस्ते हुए गोपी रूप में महादेव से वर मांगने को कहा। महादेव ने यह वर माँगा की ”मेरा वास सदैव आप दोनों के चरों में हो”।

श्री कृष्ण ने तथास्तु बोलकर, महादेव को वंशीवट के पास गोपेश्वर महादेव के नाम से स्थापित किया। श्री कृष्ण ने राधा रानी समेत सभी गोपियों के साथ गोपेश्वर महादेव की पूजा की और कहा की ”किसी भी श्रद्धलु की ब्रिज वृंदावन की यात्रा तभी पूरी होगी जब वह गोपेश्वर महादेव के दर्शन कर लेगा अन्यथा उसकी यात्रा अधूरी ही रहेगी।

महादेव आज भी वृंदावन में गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान है और हर शाम उनका अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। मंदिर के बहार पारवती जी, नंदी जी और गणेश जी स्थापित है।

कहा जाता है की आज भी हर रात्रि निधिवन में श्री कृष्ण राधा रानी और अन्य गोपियों संग रास करने आते है।

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