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उद्धव गीता (भाग १ [1] – परिचय और रचना)1 min read

श्री-कृष्णा-उद्धव-गीता

उद्धव गीता का परिचय और रचना

कौन थे उद्धव?

कुछ ग्रंथों के अनुसार उद्धव श्री कृष्ण के चचेरे भाई थे। उद्धव श्री कृष्ण के पिता वासुदेव के भाई के बेटे थे। उद्धव जी श्री कृष्ण के साथ सदैव ही सारथी के रूप उनके साथ रहे।

क्या है उद्धव गीता?

उद्धव गीता की रचना श्री कृष्ण और उद्धव के बिच हुए संवाद पर आधारित है।

जब विष्णु अवतर श्री कृष्ण को यह ज्ञात हुआ की उनका गौलोक वापस जाने का समय निकट आ चूका है जब श्री कृष्ण ने उद्धव को अपने पास बुलाया और प्रेमपूर्वक यह कहा की,”उद्धव, मेरे इस अवतार काल में वरदान स्वरूप बहुत से लोगो ने मुझसे कुछ न कुछ माँगा है, पर उद्धव तुम ने आज तक कुछ नहीं माँगा! बोलो तुम क्या मांगना चाहते हो?

उद्धव ने इस बार भी कुछ नहीं माँगा। उद्धव ने कहा वे चाहते है की श्री कृष्ण के उपदेशों और श्री कृष्ण के कर्मों पर उद्धव को जो कुछ शंकाएं है श्री कृष्ण उन्हें दूर कर दें।

उद्धव ने आगे यह कहा की महाभारत के सयम श्री कृष्ण ने कहा कुछ पर किया कुछ। अतः उद्धव चाहते है की वह अब उन्हें ऐसा करने का कारण समझाए।

इस बात पर श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा की महाभारत युद्ध के सयम जो बातें मेने अर्जुन से कही वो भगवत गीता थी और आज तुम जो भी सवाल करोगे और उनके जो उत्तर तुम्हे मिलेंगे वही उद्धव गीता होगी। तुम्हे आज यहाँ बुलाने का कारण ही उद्धव गीता की रचना करना था।

 

उद्धव और श्री कृष्ण के संवाद के कुछ अंश;

उद्धव: भगवन! मनुष्य का सच्चा मित्र कौन है?

श्री कृष्ण: उद्धव! जो मित्र आवश्यकता होने पर बिना अपने मित्र के कुछ बोले उसके मदद करे वही सच्चा मित्र कहलाता है।

उद्धव: श्री कृष्ण क्या आपको नहीं लगता सच्चे मित्र की जो परिभाषा आपने अभी मुझे बताई, आपके कर्म उसके अनुसार नहीं थे? आप सर्व ज्ञानी है, आप जानते थे की इस खेल का क्या परिणाम होने वाला है परन्तु आपने फिर भी युधिष्ठिर को खेल का प्रस्ताव सवीकार करने से नहीं रोका और न ही खेल का परिमाण पांडवों के हित्त में मोड़ा।

श्री कृष्ण: यह तो सृष्टि का ही नियम है, जो विवेकवान है अर्थात जिसके पास विवेक है जीत उसी की होगी। दुर्योधन विवेकवान होने के कारण विजय हुआ था और विवेकहीन होने के युधिष्ठिर पराजय हुए थे।

अपनी इसी विवेकहीनता में यधिष्ठिर ने एक और बड़ी गलती की थी, उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि जब तक वह मुझे सभा कक्ष में ना बुलाएं मैं वहाँ ना आऊं। युधिष्ठिर मेरे सामने जुआ नहीं खेलना चाहते थे इसलिए मुझे वहाँ नहीं बुलाया गया था। मैं उनकी इस प्रार्थना में बंधा हुआ तह और सभा कक्ष में नहीं जा सकता था। मैं बहार ही प्रतीक्षा करता रहा कि नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम में से कोई तो मुझे बुला ले पर उन में से किसी को भी मेरी याद नहीं आयी। वे केवल दुर्योधन को तथा अपने भाग्य को ही कोस्ते रहे।

उद्धव: प्रभु! तो आप यह कहना चाहते है कि संकट में फसे अपने भक्त की सहायता आप तभी करोगे जब वह आपको पुकारेगा। आप स्वयं उसकी मदद करने नहीं आओगे?

श्री कृष्ण: उद्धव इस सृष्टि में हर मनुष्य का जीवन उसके कर्मो के अनुसार ही चलता है। ना मैं इसे चलता हूँ और ना ही इस में कोई दखल कर सकता हूँ। मैं सिर्फ एक दर्शक या एक साक्षी हूँ और ईश्वर का धर्म यही है।

 

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