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आचार्य चाणक्य की नीति के अनुसार कौन है मनुष्य के (4) शत्रु?1 min read

आचार्य-चाणक्य-कौटिल्य

चाणक्य नीति या चाणक्य नीतिशास्त्र आचार्य चाणक्य का लिखा हुआ एक नीति ग्रन्थ है।

कौन है आचार्य चाणक्य?

आचार्य चाणक्य कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जाने जाते है। वह शिक्षक,अर्थशास्त्री, धर्मशास्त्री, और चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। आचार्य चाणक्य न्यायप्रिय, अतियंत विद्वान और साथ ही एक बहुत साधारण व्यक्ति थे। राज्य के महामंत्री हो कर भी वह नगर के बहार छोटी सी छप्पर से ढकी हुई एक कुटिया में रहते थे। एक बार जब यूनान के राजदूत ने आचार्य चाणक्य से मिलने राजसभा में आये थे तो वह उनकी राजनीति की बाते सुनकर बहुत प्रसन हुए और शाम को आचार्य चाणक्य से मिलने के लिए समय माँगा। आचार्य ने उन्हें शाम को अपने घर आने को कहा। शाम होते ही वह राजदूत उनका निवास खोजने लगे। तब उन्हें किसी ने बताया की आचार्य चाणक्य का निवास तो नगर के बहार है। उस राजदूत ने सोचा की ज़रूर की सरोवर के पास आचार्य चाणक्य का सुन्दर सा महल होगा। परन्तु वास्तविकता तो राजदूत की कल्पना से परे थी। जब उन्हें एक नगर वासी ने छोटी सी कुटिया की ओर इशारा करके यह कहा की आचार्य चाणक्य इसी कुटिया में रहते है तो यूनानी राजदूत आश्चर्चकित हो गया। जब उसने यहाँ रहने का कारण पूछा तो आचार्य  चाणक्य ने यह कहा की, ”अगर मैं नगर वासियों की मेहनत की कमाई से बने महल में रहूंगा तो नगर वासियों के पास कुटिया तक नहीं बचेगी”। यह सुन कर वह राजदूत आचार्य चाणक्य के सामने नगमस्तक हो गया।

आचार्य चाणक्य ने अपने नीतिशास्त्र (चाणक्य नीति) में मनुष्य के ४(4) शत्रुओं का वर्णन किया है।

छटे अध्याय के ग्यारवें श्लोक में आचार्य चाणक्य शत्रु का वरण करते हुए कहते है की ऋण लेने वाला पिता, परपुरुषगामिनी या व्याभिचारिणी माँ, रूपवती पत्नी और बेवकूफ पुत्र एक मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु होते है।

ऋण लेने वाला पिता;

किसी दूसरे व्यक्ति से लिया जाना वाला उधर या मांगी हुई संपत्ति को ऋण कहा जाता है। नीतिशास्त्र के अनुसार यदि कोई पिता किसी से ऋण लेकर घर का खर्च चलता है तो उसे शत्रु माना गया है। चुकी वह ऋण पिता लेता है तो उसकी अदायगी भी पिता को ही करनी होती है। परन्तु ऋण की अदायगी किये बिना अगर पिता की मृत्यु हो जाए तो उस ऋण की अदायगी का भार उसकी संतान पर आ जाता है। इस ऋण के कारण समाज में होने वाला अपमान भी संतान को ही झेलना पड़ता है। इसी कारण से ऋण लेने वाले पिता को शत्रु बताया गया है।

केवल अपने उद्यम अथवा आपने बलबूते पर घर और अपने परिवार का पालन करने वाले पिता ही सर्वश्रेष्ठ मने जाते है।

परपुरुषगामिनी या व्यभिचारिणी माँ;

परपुरुषगामिनी  या व्याभिचारिणी स्त्री उस स्त्री को कहा जाता है जिसका सम्बन्ध अपने पति के आलावा किसी अन्य पुरुष से हो। व्याभिचारिणी माँ निन्दनीय और त्याज्य है क्यूंकि वो अपने पति धर्म का पालन नहीं करती और अपने पति के खानदान(कुल) को अपमानित  करती है। ऐसी माँ के पुत्र को समाज में कभी सम्मान नहीं मिलता अतः नीतिशास्त्र उस माँ को पुत्र का शत्रु बोला गया है।

जो माँ अपने पतिव्रत का पालन करती यही और कुल को कलंकित होने नहीं देती उसे से सर्वोत्तम माना जाता है।

रूपवती पत्नी;

रूपवती पत्नी को शत्रु इसलिए कहा गया है क्यूंकि वह अपनी सुंदरता/सुन्दर्यै के अभिमान में अपने पति की उपेक्षा करती है। जो पत्नी अपने पति की उपेक्षा करे वह पतिव्रता नहीं होती। जो स्त्री पतिव्रता नहीं है वो शत्रु सामान है क्यों की वो अपना कर्तव्य भूल जाती है।

जो स्त्री अपने रूप और सुंदरता का अहंकार नहीं करती वही सुशिल मानी जाती है।

मुर्ख पुत्र;

पुत्र जो मुर्ख है और जिसे ज्ञान नहीं है उसे भी शत्रु समान माना गया है। एक मुर्ख पुत्र अपने पिता के वंश को आगे नहीं बड़ा सकता और नहीं ही भविष्य में अपने परिवार का पालन कर पाएगा इसलिए वह भी त्याज्य है।

ज्ञानी पुत्र ही अपने परिवार का पालन कर सकता है।

 

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